कोचिंग की दोस्ती

मनोहर और मधुरिमा एक साथ किसी कोचिंग में पढ़ते थे। वहां उन दोनो की हल्की हाय हैलो होती थी ।समय बीतता गया और धीरे धीरे जान पहचान एक दिन दोस्ती में बदल गई । जो कि बाद में ये दोस्ती इतनी महत्वपूर्ण हो गई , कि एक दूसरे के घर वालों से भी बात होना मिलना बात करना आम बात थी । किसी न किसी वजह से अभी तक वो लोग एक दूसरे के घर चाहकर भी नहीं पहुंचे थे। 
मनोहर और मधुरिमा मे फ़र्क़ बस इतना था। मनोहर मधुरिमा की हर बात को विशेष महत्व देता था, जबकि मधुरिमा मनोहर की बात को भी महत्व देती थी। दोस्ती के प्रभाव में मनोहर अपना अधिक से अधिक समय मधुरिमा को देता था अपना हर सुख दुःख एक दूजे से साझा करते थे। मधुरिमा भी मनोहर से बात करना खूब पसंद करती थी और किसी दिन मनोहर समय पर बात नहीं कर पाता, तो हजार प्रश्न - कहाँ थे तुम, बहुत व्यस्त हो, मेरा ख्याल तक नहीं, तुम बदल गये, मुझे बात नहीं करनी, मैं गुस्सा हूँ ...... । 
मनोहर उसे सब सच्चाई बताता, बात न हो पाने का ठीक कारण भी स्पष्ठ करता और उसे कुछ देर मनाता था मधुरिमा जल्द ही मान जाती थी,तब फिर जाकर घंटो बात होती थी। 

लेकिन कुछ समय के बाद मनोहर को ये लगने लगा (जो काफी हद तक सच भी था) कि मधुरिमा समय होने के बाबजूद मनोहर की बातों और मैसेजों को नज़रअंदाज़ करती है। ऐसे कई दिन हुआ जिसकी शिकायत अपने अंदाज़ में मनोहर करता रहता है।( मनोहर चाहता था जैसे मेरे व्यस्त होने की मैं वजह बताकर मधुरिमा को मनाता हूँ, तो मुझे भी वो मनाये समझाये) जिसका मधुरिमा ध्यान भी नहीं देती। कई दिन बात न होने पर अचानक मधुरिमा कहती है । 

मधुरिमा - क्या बात है मनोहर जो तुम हमेशा मुझे व्यस्त व्यस्त बोलते हो और कोई बात क्यों नहीं करते ( खड़े स्वर में) 
मनोहर - इस प्रश्न का उत्तर स्वयं आप है आप ही बताइये (उत्सुकता से) , वह समस्या का हल चाहता था। 
मधुरिमा - मैं क्या बताऊँ, मुझे ऐसा कुछ नहीं लगता बस थोड़ा व्यस्त हूँ तो बात नहीं कर पाती। 
मनोहर - अरे कहां इतनी व्यस्त हो हमें भी बता दो।( मीठे स्वर मे) 
मधुरिमा - कुछ नहीं घर के कामों में दिन पता नही चलता। 
मनोहर - अच्छा! काम तो पहले भी होते होंगे। 
मधुरिमा - हाँ! होते थे, लेकिन अब मुझे खुद नहीं पता समय कहाँ जाता है। 
मनोहर - कोई दिक्कत, परेशानी हो तुम मुझसे कह सकती हो। प्रिय मित्र, मैं हर समय आपके साथ हूँ। 
मधुरिमा - नहीं, कुछ नहीं। 
मनोहर - अच्छा!!! तुम बदल गई... ( भारी मन से) 
मधुरिमा - बदली नहीं हूँ लेकिन तुम्हे लगता है तो यही समझ लो। ( खीझ कर) 
मनोहर - तो अचानक से न कॉल न मैसेज कहां रोज़ घंटों बात होती थी। ऐसा क्यों? 
............ 
( 4 घंटे बाद उत्तर देती है)
मधुरिमा - वो सब छोड़ो, मैं बहुत खुश हूँ मुझे कोई दिक्कत नही है। तुम बताओ सब ठीक? 
मनोहर - शायद कोई पारवारिक वजह हो सोंचता हुआ अच्छे से बात करते हुए कहता है मधुरिमा सब कुछ ठीक है फिर ऐसा बर्ताब क्यों? (लेकिन मनोहर भीतर ही भीतर इस बात से कुंठित रहता है ) 
मधुरिमा - तुम नहीं समझोगे और कुछ तीखे शब्दों भी कह दिये, इतना सब कहने के बाद,मनोहर तुमसे कुछ कह दें तो चिड़ जाओगे इसीलिए कुछ कहते नहीं है। 
मनोहर ने इसके बाद से संबंधों को बहुत सीमित कर दिया, जिसका मधुरिमा पर कुछ भी असर नही पड़ा। 
मधुरिमा फिर रोज़ संबंध न तोड़ने की , अपने दिमाग से काम करने की, भावुक न होने की कुछ पंक्तियाँ भेजती थी। परंतु मनोहर से बात अपने समय तथा अपनी मर्जी के अनुसार करती थी। 
मनोहर की इज्जत बेइज़्ज़ती से मधुरिमा को कोई फर्क नही पड़ता, मनोहर अब सिर्फ एक खिलौना बन कर रह गया जिसे जब चाहो बात करो, जब मन करे कुछ बता दो, जब मन करे उसे बुरे शब्द बोलकर हीनता की भावना भर दो जो कि मनोहर को लगता था ( जिस पर मधुरिमा का तनिक भी ध्यान नहीं था)। 
मधुरिमा द्वारा लिये वादे को मनोहर ने बखूबी निभाया । बात तो अब भी होती है लेकिन धीरे धीरे इतनी मजबूत दोस्ती और स्नेह का सफल न होना मनोहर के दिल मे घर कर गया।
अंततः मनोहर खुद कहता है -
किसी व्यक्ति से संबंध को मधुर करने के लिए अपना इतना समय नही दिया जाना चाहिए जिससे उसे आपके समय की अहमियत ही न रहे। और कल को वो समय होने पर भी जब आपको समय न देकर आपकी और आपके समय की उपेक्षा करेगा, तथा अपने निजि सम्मान को बरकरार रखते हुये अपने पूर्वी रिश्तों से तुलनात्मक रवैया अपनायेगा। तो आप उपेक्षित होकर उनके बदलते व्यवहार से समय रहते हुए उस संबंध की मधुरता को एक ओर से बचाते हुये दोस्ती हार जायेंगे। साथ साथ संबंध को भी खो देने के लिये विवश हो जायेगें। इसीलिए भावुकता वहीं दिखाये जहां आपको तुलनात्मक दृष्टि से न देखा जाये। और आपके सम्मान को अपना मानकर हर पटल पर आपकी आवाज़ बनकर आपके सामने और पीछे दोनो अवस्थाओं में निःस्वार्थ भाव साथ रहे जो कि आपको महसूस हो। 
दोषों से न घबराइये - यदि आप पर वो अपने को सर्वज्ञ मानकर दोष रख भी देंगे तो क्या हुआ ? 
आप सच्चे हैं तो सभी लोग आपके साथ रहेंगे दिल में ये सुकून रहेगा कि न किसी की उपेक्षा की न ही होने दी। यदि आप किसी से संबंध खो रहे है तो आपसे भी कोई रिश्ता बिगाड़ रहा है। 
धन्यवाद। 
रुद्रांश त्रिगुणायात

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