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प्रेम

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मैं तुम्हारी उदासी और तकलीफ भरे हर दिन में तुम्हें मुस्कान देना चाहता हूँ।  उस दर्द को कम करना मेरे हाथ में नहीं है लेकिन उन असहज दिनों में तुम्हारे माथे को चूमकर अपने हाथों से चाय पिलाना मेरे लिये बहुत विशेष होगा। प्रेम में जटिलता नहीं ,प्रेम में खुशियों का आसमान देना चाहता हूँ - रुद्रांश त्रिगुणायत

कोचिंग की दोस्ती

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मनोहर और मधुरिमा एक साथ किसी कोचिंग में पढ़ते थे। वहां उन दोनो की हल्की हाय हैलो होती थी ।समय बीतता गया और धीरे धीरे जान पहचान एक दिन दोस्ती में बदल गई । जो कि बाद में ये दोस्ती इतनी महत्वपूर्ण हो गई , कि एक दूसरे के घर वालों से भी बात होना मिलना बात करना आम बात थी । किसी न किसी वजह से अभी तक वो लोग एक दूसरे के घर चाहकर भी नहीं पहुंचे थे।  मनोहर और मधुरिमा मे फ़र्क़ बस इतना था। मनोहर मधुरिमा की हर बात को विशेष महत्व देता था, जबकि मधुरिमा मनोहर की बात को भी महत्व देती थी। दोस्ती के प्रभाव में मनोहर अपना अधिक से अधिक समय मधुरिमा को देता था अपना हर सुख दुःख एक दूजे से साझा करते थे। मधुरिमा भी मनोहर से बात करना खूब पसंद करती थी और किसी दिन मनोहर समय पर बात नहीं कर पाता, तो हजार प्रश्न - कहाँ थे तुम, बहुत व्यस्त हो, मेरा ख्याल तक नहीं, तुम बदल गये, मुझे बात नहीं करनी, मैं गुस्सा हूँ ...... ।  मनोहर उसे सब सच्चाई बताता, बात न हो पाने का ठीक कारण भी स्पष्ठ करता और उसे कुछ देर मनाता था मधुरिमा जल्द ही मान जाती थी,तब फिर जाकर घंटो बात होती थी।  लेकिन कुछ समय के बाद मनो...

भावुक उपहार

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सुखीराम बाबा और पुष्पा दादी दोनो एक बुजुर्ग दंपत्ति थे। दुर्भाग्य से उनके कोई संतान भी नहीं थी। वर्षों से एक झोपड़ी में रहकर जैसे तैसे जीवन यापन कर रहे थे। बाबा मजदूरी करते थे तो दादी कोई छोटा मोटा काम करती जिससे की दो वक़्त की रोटी इज्ज़त से खाने में बाबा की मदद कर पाये। आज के युग में भी न ही बिजली का कनेक्शन न ही की टेलीफोन की सुविधा और तो और खाना भी लकड़ी बीन कर लाने पर ईंट के चूल्हे पर बनता था। बाबा और दादी का प्रेम और जिंदा दिली देखो तो उनका चेहरा आँखों के सामने से जाता ही नहीं है उनकी मजबूरी ये कि पहनने को पांव में चप्पल नहीं , लेकिन ख़ुद्दारी ये कि हाथ किसी के आगे नहीं फैलाया।  अचानक टिस्कु की जब मुलाक़ात बाबा दादी से होती है तो बाबा मैले फटे कुर्ते धोती में और दादी एक सूती साडी में जो कई जगह से सिली हुई थी। टिस्कु ने जब उनको देखा तब तक वो अपनी अवस्था के कारण कुछ भी मेहनत का काम नहीं कर सकते थे।बाबा दफ्तर में बहुत हिम्मत करके एक उम्मीद से दादी की ज़िद पर पंहुचे। वहां टिस्कु ने कुर्सी पर बिठाया पूँछा बाबा बताइए मैं आपकी का साहयता कर सकता हूँ। दादी बोली बड़े लाड़ और...

वजूद

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#टूथपेस्ट करके साँस छोड़ी, लड़की खींची चली आई... परफ्यूम लगाया, 2-4 लड़कियाँ आकर लिपट गई.... सेविंग की, देखकर लड़की मर मिटी..... नई लांच बाइक लेकर निकले तो लड़की खुद से पीछे आकर बैठ गयी....   मतलब पुरुषों से संबंधित चीजों के विज्ञापन का सार यही है कि मंजन करो,लड़की पटाओ..... परफ्यूम लगाओ,लड़की पटाओ..... क्रीम लगाओ लड़की पटाओ.....  जैसे लड़की भावनाएं,प्रेम कुछ नही देखती बस मंजन, परफ्यूम और बाइक देखती है.......  वो असल मे समाज का मनोविज्ञान जानते हैं..... पर आपको कभी ये बेज्जती नही लगती क्या...... क्या एक विवाहित और पत्नी के लिए समर्पित पुरुष परफ्यूम इसीलिए लगाता है.... मंजन इसीलिए करता है कि लड़की पटा सके..... नही.... कतई नही..... यही है स्त्री का बाजारीकरण..... पूंजीवाद कभी नैतिकता नही देखता...... वो सिर्फ मुनाफ़ा देखता है..... आपको ये कुछ भी लगता हो पर मुझे स्त्री, पुरुष दोनो के सम्मान पर चोट लगते हैं ऐसे विज्ञापन.......  मेरा आपसे सवाल है कि क्या स्त्री को परफ्यूम, मंजन,क्रीम लगाकर बिस्तर तक ले जाया जा सकता है.... ??  क्या पूंजीवाद मे इतना सस्...